सोमवार, 7 दिसंबर 2009
अब अरण्य कांड की बात करो...
शौरी के मौजूदा बयान का क्या मतलब निकाला जाए। पार्टी के कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे हैं। खासतौर वे लोग, जो छह दिसंबर को राष्ट्रीय गौरव का दिन मानते रहे हैं। भाजपा में अयोध्या को लेकर लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर विहिप के अशोक सिंघल और शिवसेना के बाल ठाकरे तक के जो बयान आ रहे हैं, उनसे लगता है कि इनमें से किसी ने संत तुलसीदास की श्री राम चरित मानस नहीं पढ़ी है। इन्हें नहीं मालूम कि अयोध्या कांड के बाद अरण्य कांड आता है। इसका मतलब है कि भटको, विचरण करो। अर्थात सत्य की तलाश करो। वैसे भाजपा पर यह बात सच बैठ रही है। अयोध्या कांड के (खल)नायक कल्याण सिंह छह दिसंबर, 1992 के बाद हिंदू स्वाभिमान के प्रतीक बन गए थे। तब तक वह आम राय से चलते थे। बाद में वह भटक गए। उनके लिए एक ही राय (बताना जरूरी है क्या)अहम हो गई। सपा से निकाले जाने के बाद तो कल्याण एक जाति के भी गौरव नहीं रह गए लगते हैं। आडवाणी ने भी जिन्ना के मुद्दे पर धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ना चाहा था, अब कहां हैं। अब लोग उनको हेय पुरुष मानने लगे हैं।
भाजपा के साथ लगातार चल रहे घटनाक्रम से लगता है कि भाजपा को अभी किष्कंधा कांड देखना है। भाजपाइयों को सुंदरकांड का पाठ करना होगा। लंका कांड यानी रावण(वक्त के साथ बदलते रहते हैं। आप अनुमान लगाएं और बताएं )का बध भाजपा के लिए अभी बहुत दूर है। सभी को मालूम है कि लंका कांड बगैर राम राज्य की कल्पना साकार नहीं होगी।
मंगलवार, 7 अप्रैल 2009
जब तोप मुकाबिल हो...
चुनाव की चखचख के बीच नामी पत्रकार जरनैल सिंह द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंकने(जूता उछालना ज्यादा ठीक है) की घटना ने काफी कुछ कह दिया है। इस पर अभी बहस और चर्चाओं का सिलसिला चलेगा। मामला आखिरकार पत्रकारों से जुड़ा है। मैं जल्दी में अपनी प्रतिक्रिया के लिए शब्द ही नहीं तलाश पाया। चिंतन-मंथन के बाद मैंने कुछ इस तरह सोचा हैः
1. जूतों का व्याकरणीकरण और मुहावरीकरण यों ही नहीं हुआ। जब कोई कहता था कि जूतों में दाल बंट रही है तो कुछ भी समझ में नहीं आता था। फिर सुना कि मियां की जूती मियां की चांद भी मुहाबरा है। इसको निजी क्षेत्र में काम करने वाले जब-तब महसूस करते हैं। कई बार आदमी अपने झूठ और गलतियां छिपाने के लिए कह देता है कि आपका जूता मेरा सिर।
2 जूतों का बाजारीकरण तब हुआ था,जब मॉडल मिलिंद सोमण और मधु सप्रे ने एक जूते का विज्ञापन किया था। इसको लेकर पैदा हुए विवाद ने जूते की कदर बढ़ा दी। नहीं तो मेरे स्वर्गीय बाबा उजागर लाल मिश्रा ने एक बार उनके मात्र 60 रुपये के जूते लाने पर मेरे पिताजी को ताना मारा था कि 60 रुपये का जूता हो या छह रुपये का, पहना तो पैर में ही जाना है। शायद वह अपनी यूनाइटेड किंगडम निर्मित 60 रुपये की लाइसेंसी बंदूक की कीमत आंक रहे थे।
3। यों नेता आपस में खूब जूतम-पैजार करते ही रहते हैं। लेकिन उप्र की मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी बसपा की ओर से जूतों का राजनीतिकरण कर काफी इज्जत बख्शी गई। उनके कार्यकर्ताओं ने नारा दिया था- तिलक तराजू और तलवार- इनको मारो जूते चार। हालांकि सर्वजन की पार्टी बनने की प्रक्रिया में मायावती ने इससे लगातार इनकार करती हैं। वह नेता कुछ भी कह सकती है। किसी भी बात से मना कर सकती हैं। तमाम नेता ऐसा करते रहे हैं। अब चुनाव हैं, रोज करेंगे।
4। जूतों का महत्व मुझे पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में तब समझ में आ गया था, जब मैं लखनऊ विश्विवद्यालय की रिपोर्टिंग करता था। उस समय के एक प्रो-वाइस चांसलर(बाद में वह पूर्वांचल के एक प्रतिषिठत शैक्षिक संस्थान के दो बार कुलपति रहे)और छात्रों के बीच जूते चल गए थे। तब यह अंदर के पन्ने की भी खबर नहीं बनती थी। सो इसे मैंने इसे अपने साप्ताहिक कालम में दुस्साहस कर सर आओ, जूता-जूता खेलें शीर्षक से छाप दिया। फिर क्या था। छात्र आंदोलन पर आमादा हो गए। पीवीसी साहब दबंग छवि के थे। बावजूद इसके उन्होंने अपने एक अति विश्वस्त पूर्व छात्र और मेरे अच्छे मित्र के जरिए मुझसे एतराज जताने को कहा। अंततः पीवीसी साहब से आमने-सामने की मुलाकात हुई और जूता प्रकरण समाप्त हो गया।
5। जूतों का अंतरराष्ट्रीयकरण 14 दिसंबर, 2008 को तब हुआ, जब इराक के पत्रकार मुंतजर जैदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश जूनियर पर गुस्से का इजहार करने के लिए जूता फेंक कर मारा था। भारत के पत्रकार ने इस मामले में दूसरी पायदान हासिल कर ली। हम भारतीय नंबर एक पर रहने में शायद तौहीन समझते हैं।
6। इस संदर्भ में एक शोध किया जाना चाहिए कि जूता फेंकने की घटना में कहीं आर्यो-अनार्यों की उत्पत्ति, उनके ज्ञान और उनकी अनंत यात्रा और इनसे जुड़े मिथकों से तो कोई संबंध नहीं है।
7। जमाना बदल गया है। जरनैल का जूता बनाने वाली कंपनी को चाहिए कि वह जरनैल को अपना ब्रांड एंबेसडर बना लें। इससे युवा और हाल-फिलहाल पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ रहे पत्रकारों को जबरदस्त प्रेरणा मिलेगी। वह इसे चीयर गर्ल जैसे कैरियर के तौर पर अपना सकते हैं। इसकी वजह है कि राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में पत्रकारों की कलम की कीमत कम हो गई है। वह कुछ भी लिखते रहें, शासन-प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंगती।
8। मौजूदा हालात को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री और नेताओं को ही नहीं, जिलास्तरीय अधिकारियों को ऐस व्यवस्था करनी होगी कि पत्रकार उससे मिलने से पहले अपने जूते बाहर उतार कर आएं। प्रेस कांफ्रेंस में जूते पहन कर आना वर्जित कर दिया जाए। प्रेस कांफ्रेंस स्थल को धर्मस्थल का दर्जा दिया जाए!
9। लेकिन जरूरी यह भी है कि एसी प्रेस कांफ्रेंस में माननीय मंत्री जी पूरी सत्यनिष्ठा से वक्तव्य दें। देश और समाजा से जुड़े़ सवालों पर गुमराह करने की कोशिश न की जाए। नेता इन आयोजनों का सांप्रदायिक उन्माद फैलाने, भ्रष्टाचारियों का बचाव करने और विरोधियों पर अनर्गल आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल न करें।
बुधवार, 25 फ़रवरी 2009
जय हो, कुख्यात हो गए...
लगे हाथ मेरी मिट्टी के तेल के कारोबार से संबंधित चंद लाइनों पर भी गौर फरमा लें- अगर न होता मिट्टी के तेल का कारोबार। कितने लोग मिट्टी में मिल गए होते। मिट्टी के तेल के दाम मिट्टी से भी ज्यादा हैं। अधिकारी इन्हीं दामों का फायदा उठाते हैं। देश भर में डीलर बनाते हैं। बीपीएल कार्ड धारकों की यह मजबूरी है। वहां इससे ही रोटी बनना जरुरी है। इसकी एक और उपयोगिता है। पेट्रोल से इसकी प्रतियोगिता है। गरीब या अमीर महिला जब जान देती है या उसको जलाया जाता है। जलने-जलाने वाले मितव्ययी हो जाते हैं। वे पेट्रोल नहीं,केरोसिन आयल ही आजमाते हैं।
बुधवार, 11 फ़रवरी 2009
कभी-कभी मेरे दिल में...
तो बात ब्लाग शुरू करने के बाद की। मैं जब भी कोई ब्लाग पढ़ता हूं, तो उसके लेखक/ब्लागर के प्रोफाइल के बारे में जानने की इच्छा स्वाभाविक रूप से जागती है। मेरे ब्लाग को पढ़ने वालों ने भी मेरे बारे में जानना चाहा। हिट्स इसे साबित करती हैं। मैं उसमें क्या लिखूं। दूसरों के लिए जो आम है, वह हमारे लिए खास है। खुला खेल फरुक्खाबादी की तर्ज पर मैं अपने बारे में बताना चाहूंगा। ऐसा सच सामान्य है। और भी लोगों का होगा। बहरहाल, पद्य की शक्ल में एक बानगी देखिएः
माता-पिता ने जीवन भर कष्ट सहे
इसीलिए हम उनके साथ कभी नहीं रहे
पढ़ाई बढ़ती गई
जमीन बिकती गई
जमाने से टकराने को कई बार अड़े
गिरे-पड़े, हो गए अपने पैरों पर खड़े
एक दिन नौकरी लग गई
पड़ोसियों में भी आस जग गई
उन्होंने जब पूछा- पता और ठिकाना
मैंने बना दिया कोई न कोई बहाना
एक दिन वे बिना बताए आ गए
कुछ दिन रुके और सारा राशन खा गए
मैं उनके काम में कोई मदद नहीं कर सका
उन पर कोई अहसान नहीं धर सका
वापस लौट उन्होंने सारी पोल खोल दी
पूरे खानदान की हैसियत तौल दी
मां-बाप को बहुत बुरा लगा
मैं सिद्धांतवादी, मुझे बेसुरा लगा
फिर भी कुछ नहीं कर पाया
झट से कोने में मुंह छिपाया
अपनी लाचारी पर रोया बार-बार
क्यों नहीं कर पाया उपकार
यह तो अतीत था। भविष्य की कल्पना पर ध्यान दें। अनुमान लगाएं कि ये काम कौन सा हैः
आज देखता हूं कि काम कराने वाला ही कर्मठ होता है
ऐसे हर आदमी का एक मठ होता है
मठ में दिखावा होता है
उसमें चढ़ावा होता है
जो लेकर आता है, खोता है
खाली हाथ वाला रोता है
देखते-देखते मैं भी हो गया हूं दयावान
जानवर जैसे इनसानों का भगवान
अब हजारों आते हैं
मैं-मेरे लोग काम कराते हैं
छोटी-मोटी कई बीमारियां हो गई हैं
बीवी-बेटा और बच्चियां कहीं खो गई हैं
अपने बजाय किसी और की स्थापना में चापलूसी लगेगी
अच्छी बात यह है कि कइयों में बड़ी उम्मीद जगेगी
अब आपको अपने वर्तमान के बारे में बताते हैंः
व्यथित है हिमालय धरती में है वेदना
चिंताएं हमारी बढ़ गई, नहीं बढ़ी चेतना।
योग हमने छोड़ा, पहली पसंद हुआ क्रिकेट खेलना
फिर भी सीखा नहीं हार को देखना-झेलना।
राजनीति सबसे बुरी, आसानी से कह दिया
पर छोड़ा नहीं हमने नेताओं के आगे लेटना।
स्वार्थ में हमने दूसरों को गले लगा लिया
शर्म गायब, जब शुरू किया अपनों के जख्म कुरेदना।
रावण के सारे तीर हमने चुरा लिए
अपुन का इरादा है राम की मर्यादा को भेदना।
लोगों में छबि इतनी हो गई है अच्छी-खराब
छोटों को नसीहत देते हैं-सच बोलना है मना।
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009
मन जब अस्थिर होता है...
बहरहाल, लाइनों पर गौर फरमाएं-
अनवरत आते हैं नए विचार
करते हैं आपस में व्यभिचार
जब नहीं हो पाते हैं सहमत
किसी पर भी मढ़ते हैं तोहमत।
इससे मिलती-जुलती लाइनें कुछ इस तरह हैं-
अपने मन का सोचा दूरंदेशी लगता है
हर समस्या के निदान पर संदेशी लगता है
लेकिन अपना कुछ खोने का डर सताता है
यही मन झटके से बचने की राह बताता है
अब बात करते हैं उन शब्दों की जिनको कई लोग अपशब्द नहीं मानते। उनके चाटुकार कहते हैं कि यह तो उनके प्यार का स्टाइल है। संभवतः इसका कारण है-
कुछ सुनने को नहीं हम तैयार
हमे पशुओं से है बेहद प्यार
वजह, दिन-रात, चौबीस घंटे
हम खुद बार-बार वही होते हैं यार
तो बात गधे (कामकाजी और दुनियादरी वाले लोगों के बीच अति कामन शब्द) से शुरू करते हैं-
घर-बाहर जो हर जगह निष्ठा से बंधा होता है
बड़ों से छोटों तक की नजरों में गधा होता है
जब तक उसने कुछ को कहीं का नहीं छोड़ा
जमाना उसे नहीं मानता उसे घोड़ा
क्या करें, हमारे जैसे कई लोग एक से ही सधे हैं
इसलिए हम फिक्र नहीं करते कि हम गधे हैं
सुअर के बारे में मेरा मानना है-
हम मुंह जरूर मारते हैं इधर-उधर
बावजूद इसके नहीं पालते सुअर
क्योंकि सुअर का बच्चा प्यारा होता है
बड़ा सुअर तो पक्का आवारा होता है
अगर इन लाइनों पर लालित्य और साहित्य से वंचित मेरे जैसे व्यक्ति के बारे में आलोचना, प्रशंसा या फिर रस्मी टिप्पणियां आती हैं, तो अगली बार कुछ और पशुओं की बात करेंगे। लेकिन याद रखिए-जानवर घर-जंगल में रहते हैं, उनके क्या कहने
आदमियत खो गई, ताने पड़ रहे उसको सहने
बुधवार, 7 जनवरी 2009
अब तो सबक ले लो...
रविवार, 28 दिसंबर 2008
युद्ध तो नहीं होगा, पर...
बहरहाल, अब महत्वपूर्ण बात यह कि केंद्र सरकार और कांग्रेस को वहां बनने वाली सरकार को लेकर पूरी गंभीरता बरतनी होगी। जरा सी चूक पूरे देश के लिए भारी पड़ेगी। वजह यह है कि वर्ष, 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद पहली बार वहां के आम लोगों का भरोसा बढ़ा था। इसका श्रेय उस समय के चुनाव आयोग के अधिकारियों को तो जाता ही है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की इस बड़े और शांतिपूर्ण आयोजन में शानदार भूमिका रही थी। इससे पहले वहां के लोग मानते-कहते थे कि चुनाव तो औपचारिकता के लिए कराए जाते हैं। मुख्यमंत्री कौन होगा (ज्यादातर डॉ. फारूक अब्दुल्ला)दिल्ली (केंद्र सकार) पहले ही तय कर लेती है। वाजपेयी साहब ने सब कुछ वहां की जनता पर ही छोड़ दिया था। त्रिशंकु विधानसभा और मिलीजुली सरकार बनी। जम्मू कश्मीर के तीनों खित्तों जम्मू, कश्मीर और लद्दाख का समुचित विकास हुआ। अमरनाथ श्राइन बोर्ड भूमि विवाद के कारण भाजपा को चुनावी लाभ हो गया है, तो कांग्रेस को जम्मू के मामलों में फैसला लेने में देरी का शिकार होना पड़ा। एक अहम फैसले पर स्टैंड न लेने से उसके द्वारा दो साल में कराए गए विकास कार्य पीछे हो गए। पीडीपी को घाटी में लाभ अपने स्टैंड के कारण ही मिला। चुनाव आयोग ने अपना काम बहुत अच्छे से पूरा किया है। अब कांग्रेस को सोचना होगा कि वह किसकी सरकार बनने देगी। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी को यह मानना ही होगा कि लोगों ने उनको पहले जैसा ही मैनडेट देकर उनके और उनकी पाटिर्यों के बारे में अपनी राय साफ कर दी है। जम्मू कश्मीर की जनता का जनादेश अलगाववाद और आतंकवाद के खिलाफ है। पिछली सरकार के कार्यकाल में उसने विकास की बयार देखी है। आतंकवाद से लड़ने का उसका हौसला भी बढ़ा है। उ़डी-मुजफ्फराबाद और पुंछ-रावलाकोट सड़क मार्ग खुलने के बाद पार से यहां आए रिश्तेदारों से बातचीत के बाद तमाम लोगों लोगों ने आजादी के नारे से तौबा कर ली है।
रियासत के आवाम की इन भावनाओँ को निरादर-अनदेखी करना कांग्रेस के लिए एक और कलंक का कारण बनेगा। सात दशक पुरानी कश्मीर समस्या को लेकर तमाम आरोप झेल रही कांग्रेस के लिए एक आरोप को कम करने का समय है। पिछली बार चुनाव के बाद राष्ट्र हित में पीडीपी की सरकार बनवाने वालों में प्रधानमंत्री डॉ।मनमोहन सिंह की सबसे अहम भूमिका थी। अब फिर उनकी ही बारी है।
रविवार, 14 दिसंबर 2008
खबरें अभी और भी हैं...
देखा आपने। आतंकवाद पर संसद में एकजुटता की हवा अगले ही दिन निकल गई। लोकसभा चुनाव में आतंकवाद को मुद्दा बनाने की सोचने वाले हमारे तमाम मंत्री और नेता 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हमले के दौरान शहादत देने वाले सुरक्षाकर्मियों को याद करने और उनके परिजनों को सांत्वना देने के लिए समय नहीं निकल पाए। धीरे-धीरे आम लोगों का गुस्सा भी कम होता जा रहा है। आतंकवाद और पाकिस्तान के खिलाफ की जा रही बातें भी हल्की पड़ गई हैं। यह अलग बात है कि खुद और अपने रिश्तेदारों को लेकर सामान्य से आदमी की भी चिंता ज्यादा बढ़ गई है। यह आम आदमी महंगाई से लड़ने के लिए तो अपने खर्च में कटौती कर सकता है, पर आतंकवादियों और आत्मघाती दस्तों का मुकाबला कैसे कर सकता हैं।
उसे अपनी और समस्याओं से ही जूझने का वक्त नहीं है। वह उनसे ही हिम्मत हार चुका है। उसे उदारीकरण और वैश्वीकरण की हवा ले डूबी है। उसने कुछ दिन इस अनायास नहीं दिए। उन्हें लगा कि अगर वे राष्ट्रीय शोक की इस घड़ी में शामिल न हुए तो वे एक नागरिक की जिम्मेदारी निभाने से चूक जाएंगे। फिर टीवी ने भी तो इतना मुंबई दिखाया कि उसे और कुछ नहीं सूझ रहा था।
अब उसे फिर वहीं रोजमर्रा की दिक्कतें नजर आने लगी हैं। सो इस तबके में से ज्यादातर का मूड चुनावी हो रहा है। अब उसे लोकसभा चुनाव नजर आएगा। अपनी निष्ठा वाली पार्टी लुभाएगी। उसके लिए वह तर्क-वितर्क और कुतर्क करेगा। झगड़े-फसाद करेगा। महंगाई के बारे में तरह-तरह के दावे किए जाएंगे। थोड़े समझदार लोगों के लिए आंकड़ों से खेलना और उनसे छेड़छाड़ बहुत आसान होती है। जो चिंतन करेगा उसके लिए मंदी कम और इसके चलते फैलाया जा रहा खौफ काबिले जिक्र होगा। यह सच है कि मंदी के इस दौर में हजारों करोड़ टर्नओवर वाली कंपनियों के अधिकारी और कर्मचारी ज्यादा परेशान हैं। उन्हें अपनी सुख-सुविधाएं छिनने की चिता सता रही है। जमीन से अलग हट जाने और जमीन बेच देने वालों का ह्श्र यही होता है। तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों में बड़े पद और पैकेज पर काम करने वाले लोग औसत बुदि्धमान लोग ही हैं, लेकिन रुतबा बढ़ने पर उन्होंने जमीन पर चलना तो दूर जमीन पर चलना तक छोड़ दिया था। अब उन्हें जमीन दिखेगी कि नहीं। देखेंगे।
अगर मंदी की मार कुछ दिन और चली, तो यकीन मानिए कि खुदकुशी करने वाले अधेड़ और बुजुर्गों की संख्या बढ़ जाएगी। बेरोजगार नौजवानों में नशे की लत और बढ़ जाएगी। इनमें कोई भी आतंकी हो सकता है। आतंकवाद को रोकने के साथ-साथ संरकार को इन लोगो को आतंकी बनने से रोकना भी चुनौती होगी। वैसे, भारत में चुनौती स्वीकार करने और देने को लेकर खास गंभीरता नहीं दिखाई जाती। संभव है कि चुनौतियों के चक्रव्यूह में हम सब कहीं एक बार फिर न घिर जाएं। इसमें फायदा होगा, जिनका-सबते नीके मूड़, जिन्हैं न व्यापै जगत गति- में यकीन है। हमें इंतजार है उनका, जो कहते हैं-ऐ वतन की रेत मुझे ऐड़ियां तो रगड़ने दे मुझे यकीं है पानी यहीं से निकलेगा।
रविवार, 7 दिसंबर 2008
थोड़ा पालिटिकल हो जाए...
मुंबई की धमक आठ दिसंबर से कम हो जाएगी। जिन चार राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए हैं। उनके नतीजे आएंगे। मध्य प्रेदश और छ्त्तीसगढ़ में भाजपा को वापसी की उम्मीद है। दिल्ली कांग्रेस के हाथ में रह सकती है। राजस्थान में ऊंट किसी करवट बैठ सकता है। नेता फिर बोलने लगेंगे। उनसे बुलवाया जाएगा। कांग्रेस और भाजपा के नेताओं से पूछा जाएगा कि बसपा-सपा ने उनका क्या नुकसान किया जाएगा। वार्ड स्तर का नेता भी हार-जीत के लिए तर्क गढ़े़ हुए बैठा है। प्रवक्ता सैलून में जाकर टीवी चैनलों पर आने की तैयारी कर चुके हैं। नए सूट (शिवराज पाटिल का प्रचार ज्यादा हो गया था ) सिलाए जा चुके हैं। मानकर चलिए कि मुंबई के धमाकों के बाद बैकफुट पर आए नेता सोमवार से धमाके करने को तैयार हैं। कोई किसी की टोपी (हालांकि कोई नेता पहनता नहीं है। कपड़े भी फाड़े जाते हैं) उछालेंगे। जवाब में दूसरा उसके नेता के व्य़क्तित्व और कृतित्व पर सवाल खड़े कर देगा। कल से केंद्र की नई सरकार बनने लगेगी। नए गठबंधन बनने-बिगड़ने लगेंगे। सांप्रदायिक शक्तियों से मुकाबले की आड़ में सौदेबीजी शुरू हो जाएगी। मौकापरस्त नेता अपने-अपने मैदान छोड़ने का ऐलान करने लगेंगे। फ्रेंडली फाइट से नए समीकरण बनाए जाएंगे। यूपीए ने पेट्रोलियम पदार्थों के दाम घटाकर इसकी शुरूआत कर दी है। मंदी से निपटने के लिए रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट कम किए जाने के बाद कर्ज की दरें और सस्ती कर दी जाएंगी। संदेश होगा। ऋण लो और धंधा शुरू कर दो। चार साल बाद हो सकता है कि इसे माफ कर दिया जाए। कागजों पर महंगाई मार्च-अप्रैल तक नहीं बढ़ने दी जाएगी। मुंबई ने केंद्र का जनवरी-फरवरी में लोकसभा चुनाव का प्लान फेल कर दिया है। नहीं तो अगले बजट में कुछ और नए टैक्स लगना तय था।
फिर क्या हमें मुंबई के धमाके याद रह पाएंगे। खूब सोचिए। जवाब नहीं में आएगा। हम देश को आजादी दिलाने वालों को भी तो भूल ही गए हैं। रस्म अदायगी जरूर करते रहते हैं। क्या करेंगे। हर आदमी जो पालिटिकल हो गया है। हो सकता है कि नेतागण इसे चुनावी मुद्दा बनाने से बाज न आएँ।
बुधवार, 3 दिसंबर 2008
शुक्रिया, अमर उजाला का ब्लाग कोना पढ़ें...
नेता माने ताने...
सच है। देश इन तानने वाले नेताओं के मकड़जाल में बरसों-बरस से उलझा हुआ है। उसने नारों की आ़ड़ लेकर जनता को हमेशा मूर्ख बनाया है। नेता जानना ही नहीं चाहता है कि आम जनता की भावनाएं भी होती हैं। अपने आलाकमान को खुश करने के लिए, वोट बटोरने के लिए नेता के मन में जो भी आता है, कह देता है। रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव और समाजवादी पार्टी के महसचिव अमर सिंह भी इसी बिरादरी में आते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी एक बार कहा था कि उनका वोटर अखबार नहीं पढ़ता है। बाद में उन्हें पता चल गया था कि पाठक अखबार ही नहीं पढ़ता है, सच्चाई भी समझता है। क्या यह इससे जाहिर नहीं होता कि 1989 के बाद उन्होंने जोड़-तोड़ ही सरकारें बनाई। अब तो टीवी ने लोगों को लाइव घटनाएं दिखाकर छिपाने के लिए कुछ बाकी ही नहीं रखा है। दरअसल, मुंबई की घटनाओं के बाद नेताओं के पास मुंह दिखाने का कोई रास्ता नहीं बचा है। बावजूद इसके टीवी पर अपना खुद का चेहरा दिखाने की ललक और अखबारों में अपने बयान को बड़ा देखने की तड़प उन्हें बिना सोचे-समझे बयान देने के लिए मजबूर कर रही है।
ऐसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बरकरार रखने और इसकी मजबूती के लिए कुछ कदम उठाया जाना जरूरी है। एक- मतदान के दौरान प्रत्याशियों के चुनाव चिह्न के साथ एक कालम यह भी हो कि इनमें से कोई नहीं। इस तरह हम मतदाता को अपनी नापसंद भी व्यक्त करने की आजादी दे सकते हैं। इससे नकारात्मक मतदान बढ़ सकता है। दूसरा- अगर कोई उम्मीदवार 40 फीसदी से कम वोट पाकर जीत जाता है, तो उसका कार्यकाल पांच वर्ष के बजाय दो साल करने का प्रावधान किया जाए। उसको दी जाने वाली सुविधाओं में भी इसी हिसाब से कटौती की जाए। दो साल बाद फिऱ चुनाव कराया जाए। तब तक कम अंतर से जीतने वाले प्रत्य़ाशी के पास अपना अंतर सुधारने का मौका रहेगा। तीन- जनता को जीते हुए उम्मीदवार को वापस बुलाने का अधिकार दिए जाने पर जल्दी ही फैसला आना चाहिए। इसके लिए कई संगठन प्रयासरत भी हैं। कहीं ऐसा न हो जाए कि हाल-फिलहाल जनता जिन नेताओं का विरोध धरना-प्रदशर्न और रैली निकालकर करती है, हिंसक हो जाए। नेताओं को बीच बाजार सरेआम अपमानित किया गया, तो हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा दाग लग जाएगा।
शुक्रवार, 28 नवंबर 2008
बच्चों को बताना ही पड़ेगा...
करीब डेढ़ दशक से ओजोन परत में छेद, ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण के बारे में भी बच्चे किसी भी आम नागरिक से ज्यादा जानने लगे हैं। ये जाररूकता बच्चों में इसलिए आ पाई, क्योंकि उन्हें पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने की प्रेरणा पूरे मनोयोग से दी गई। शिक्षकों ने उन्हें पर्यावरण के हर पहलू से से बकायदा परिचित कराया गया। हम भले ही पालीथिन का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं, पर हमारे बच्चों को इससे होने वाले नुकसानों के बारे में सब कुछ पता है। प्राइमरी के बाद के विद्यार्थियों को सेक्स एजूकेशन दिए जाने पर थोड़ी-बहुत ना-नुकर के बाद करीब-करीब सहमति बन रही है।
ऐसे में जरूरी हो जाता है। टीवी पर मुंबई की लाइव मुठभेड़ और कमांडो कार्रवाई देख रहे नौनिहालों को आतंकवाद पर उसी तरह से बताया जाए, जैसे हम इतिहास को पढ़ाते हैं। बच्चों को बताना होगा कि अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और ब्रिटेन के मेट्रो रेलवे पर हमले किस नापाक मकसद के लिए किए गए थे। उनके लिए यह जानना भी बेहद जरूरी होगा कि 1993 में मुंबई में पहली बार हुए सीरियल बम ब्लास्ट के पीछे हमारी क्या खामियां रही थीं। इन्हें हम आज तक शायद दुरुस्त नहीं कर पाए हैं। 1999 में हमें किन हालात में अजहर मसूद को जम्मू जेल से रिहा कराने के बाद तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने कंधार ले जाकर छोड़ा था। हो सके तो यह भी बताया जाए कि मालेगांव विस्फोट में हिंदू आतंकियों और सेना की क्या भूमिका थी।
कोई रहनुमा नहीं आएगा...
चाहे वह पाकिस्तानी आतंकवाद हो या और हमारे देश में ही बैठे लोगों द्वारा की जा रही करतूतें हों। आतंकवाद हमारी राजनीति का मुद्दा तो रहा, लेकिन चिंता की मुख्य वजह नहीं बन पाया। उदारीकरण ने हमारी सोच को संकुचित कर दिया है। हमारे लिए समाज और देश के मायने भी बदल गए हैं। राजनीतिज्ञों ने जनता का जितना इस्तेमाल अपने लाभ के लिए किया, जनता उससे कहीं ज्यादा उनका इस्तेमाल करने की सोचने लगी। हालांकि इसमें जनता हार गई, पर उसने कहना शुरू कर दिया कि राजनीति ने देश का बंटाधार कर दिया है। यह कहने वालों की भी कमी नहीं है कि देश को मरे हुए लोग चला रहे हैं।
बात सही भी है। याद कीजिए देश का वह दौर, जब उत्तर प्रदेश के सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों और रोडवेज की बसों पर एक तरफ लिखा रहता था कि परिश्रम के अलावा और कोई रास्ता नहीं। दूसरी तरफ अनुशासन ही देश के महान बनाता है, संदेश होता था। अब कड़ी मेहनत, पक्का इरादा, दूर दृष्टि जैसे प्रेरणादायी स्लोगन ही खत्म नहीं हो गए। रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे भी अपना महत्व खो चुके हैं। बहुतों को तो यह भी पता नहीं होगा कि ये सब बातें किसने कही थीं। भारीत 21वीं सदी में ले जाने का सपना देखने और दिखाने वाले राजीव गांधी भी असमय काल का शिकार हो गए। बाद में बुनियादी बातें कभी नहीं कहीं गईं। इंडिया शाइनिंग और फील गुड का गुब्बारा फूलने और उड़ने से पहले ही फट गया .
क्या माना जाए कि देश को मरे हुए नेता ही चलाते रहे हैँ। आज के नेताओं को मजबूरी के चलते भी कोई नेता नहीं मान पा रहा है। गरीबी, बेरोजगारी के मामले में तो नेता कुछ भी बोलने से शायद इसलिए ही बच रहे हैं। यह हमले नेताओं के प्रति बढ़ते हुई अनास्था का ही नतीजा है।
यह भाषण नहीं है। इस समय देश को एकजुटता की जरूरत है। ऐसी ताकत की आश्यकता है, जो दुनिया को बता दे कि आतंकवाद का मुकाबला हम जाति और संप्रदाय में बटे बगैर करेंगे। चूकने पर हम एक बार फिर से सहानुभूति (अंग्रेजी में सिम्पैथी) के पात्र बन जाएंगे। जब हमें आयुर्वेद,एलोपैथी और होम्यैपैथी का इलाज मालूम है, तो सिम्पैथी की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
बुधवार, 26 नवंबर 2008
मरने वाले खुशकिस्मत हैं...
आज मध्यप्रदेश में मतदान हो रहा है। राजस्थान और दिल्ली में मतदान होना है। क्या राजनीतिक लाभ के लिए कोई राजनीतिक दल भी यह काम कर सकता है। बदकिस्मत हैं, वे लोग जिन्हें न तो आतंकियों की मजबूत गोली लगी और न ही पुलिस की गोलियां इनकी जान ले पाईं। इनके दुर्दिन आ गए हैं। घायलों को अपने जख्मों से ज्यादा पुलिस और अन्य विभाग के अफसरों द्वारा पूछे जाने वाले सवालों की चिंता करनी पड़ेगी। वे पूरे मामले में चाहकर भी निर्दोष नहीं रह पाएंगे। अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में उनका इलाज न जाने कब ठप पड़ जाएगा, क्योंकि कोई मंत्री और नेता वहां टपकने वाला होगा। उन्हें मंत्री जी और नेताओं के घड़ियाली आंसू देखने पड़ेंगे। झूठे दावे और खुद उसके लिए कोरे आश्वासन बरदाश्त करने पड़ेंगे। उनको और उनके घर वालों को उनका उद्धार करने के सपने दिखाए जाएंगे। इस काम को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनियां गांधी, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवाणी सभी करेंगे। चुनावी मुद्दा बनाने की बात की जाएगी। दिल्ली में विस्फोट के बाद अपने सूट्स को लेकर चर्चा में रहे गृह मंत्री शिवराज पाटिल शायद फिर दोहरा दें कि पोटा को फिर से नहीं लागू किया जाएगा। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह आतंकी गतिविधियों के लिए तुरंत पाकिस्तान को आड़े हाथ लेते हुए उस पर हमला करने की भी बात करेंगे। वह तब भूल जाएंगे कि उनकी पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया था और लाहौर पहुंच गए थे।
कुछ दिन तक ये सब घायलों को ही नहीं, देशभर के आहत लोगों को मजबूरी में सुनना होगा। कुछ स्कूलों के बच्चे मरने वालों की याद में धर्मस्थलों, सार्वजनिक स्थानों और समुद्र और अन्य नदियों के किनारे मोमबत्तियां जलाकर मृत आत्माओं की की शांति के लिए आयोजन करेंगे। टीवी और अखबार वाले जब पूरी व्यवस्था में खामियों और अफवाहों का जिक्र करते-करते थक जाएंगे, स्पेशल कमेंट देने वाले खूबसूरत और प्रतिष्ठित चेहरों के विचार सूख जाएंगे, तो सब कुछ भुला दिया जाएगा। कुछ घायलों की देर से होने वाली मौत खबर नहीं बन पाएगी। घायलों में अगर कोई जीवन भर के लिए अपाहिज हो गया होगा, तो उसको मुआवजा भी शायद ही मिले। अगले साल 26 नवंबर पर मरने वालों की बरसी मनाई जाएगी। इसी बहाने उनको याद कर लिया जाएगा, लेकिन घायल लोगों को तब भी शायद ही याद किया जाए।
शुक्रवार, 21 नवंबर 2008
सबके सब लाचार...
अमेरिका से शुरू हुई मंदी की मार भारत में भी पहुंच गई है। प्रधानमंत्री भरोसा दिला रहे हैं कि हमारा देश मंदी से मुकाबला करने में सक्षम है। हम इस पर पार लेंगे। यों भी मंदी हो या महंगाई सरकारों पर इससे खास फर्क पड़ता नहीं। उन्हें तो पांच साल के लिए जनता अपनी किस्मत का फैसला करने के लिए चुन ही लेती है। उनका काम आंकड़ेबाजी में देश को उलझा देना भर रहता है। आश्चर्य की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री महंगाई की दर 12 फीसदी से ऊपर पहुंचने पर भी विकास दर आठ फीसदी रहने का आश्वासन देते थे। आज विश्वव्यापी मंदी के दौर में वह इससे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। यह तब जब दुनिया के ज्यादातर देशों में यह दर चार फीसदी के आसपास आ गई है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री भी हैं। वह वित्त मंत्री से पहले रिजवर् बैंक के गवर्नर भी रह चुके हैं। बतौर प्रधानमंत्री उनके काम करने के तरीके पर व्यंग्य भले ही कितने भी किए गए हों, सवाल कम ही उठे हैं। लेकिन महंगाई और मंदी के बाद उनके बयानों पर विश्वास आर्थिक क्षेत्र के दिग्गज भी नहीं कर पा रहे हैं। यह अनायास नहीं है। शेयर बाजार लगातार गिरता ज्यादा है, संभलता कम। कच्चे तेल के मूल्य में कमी आ रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां छंटनी कर रही हैं। लोग डरे-सहमे हुए हैं। माना कि ऋणं कृत्वां घृतमं पिवेत... की सोच देने वाले चार्वाक के भारत में मितव्ययता की प्रवृत्ति है। यहां लोग चार पैसा कमाते हैं, तो आने वाले दिन के लिए एक पैसा सहेज कर रखते हैं।
लेकिन ध्यान रहे कि मनमोहन सिंह के वर्ष 1991 की नरसिंहराव सरकार में वित्त मंत्री बनने के बाद से देश में उदारीकरण की बयार चल निकली थी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के शासनकाल में इसका दूसरा दौर शुरू हुआ था। बाद में प्रधानमंत्री बनने पर मनमोहन सिंह ने इसे और गति दे दी। बैंकों ने कर्ज देने में कंजूसी नहीं की। लोन चाहिए। कुछ औपचारिकताएं पूरी करिए। मकान के मालिक बन जाइए। कार खरीद लीजिए। लोगों ने पर्सनल लोन लेकर शेयर खरीद लिए। कुछ सयानों ने फिक्स्ड डिपाजिट कर दी। इस जाल रूपी सुविधा ने आम आदमी में संचय की प्रवृत्ति को रोक दिया। अब बाहर से चमकने वाले लोग कितने कर्ज में लदे हुए हैं,अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसीलिए महंगाई को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया ही आकर रह गईं। कहीं कोई जन आंदोलन नहीं हुआ। कभी दिल्ली की सरकार को हिला देने वाले प्याज की महंगाई अब आम आदमी को हो सकता है, याद भी न रही हो। उत्तर प्रदेश में आलू किसान अब मंदी की मार झेल रहा है। किसानों ने कोल्ड स्टोरों से आलू निकालने पर उतनी कीमत तक नहीं निकल रही है कि वे उसे बेचकर उसका किराया भी अदा कर सकें। किसे चिंता है।
यूपीए सरकार तो लोकसभा चुनाव की तैयारियों में लगी हुई है। केंद्रीय कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ गई है। उनकी छंटनी न करने का भरोसा दिया जा रहा है। केंद्र को मालूम है कर्मचारियों की नाराजगी की मतलब। संभव है कि एक-दो महीने में पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी कम कर दी जाएं। जिस दिन ये हो, समझ लेना कि दो महीने में चुनाव हो जाएंगे। वैसे भी लोकसभा के चुनाव मई में होने ही हैं। तो फिर आते हैं,मुद्दे की बात पर। मनमोहन सिंह चुनावी भाषण की तैयारी करने लगे हैं। इसमें परमाणु करार का मुद्दा शायद ज्यादा लोगों को समझ नहीं आएगा। मंदी के बादल छंटे नहीं। महंगाई फिर सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी होगी।
शुक्रवार, 14 नवंबर 2008
हम तो आहत हैं...
बुधवार, 12 नवंबर 2008
बच्चों का एक ही दिन क्यों
मंगलवार, 11 नवंबर 2008
आभार, नमस्कार
गुरुवार, 6 नवंबर 2008
अमेरिका में चुनाव
इसके उलट भारत में वोटिंग को लेकर हर उस व्यक्ति की रुचि घटती जा रही है, जो खुद के जागरुक होने का दावा करते हुए नियम-कानून के पालन करने वालों में सबसे ऊपर रखता है। आपातकाल और 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद हुए चुनाव में जरूर भारी मतदान हुआ। बाद के चुनावों में मतदान के आंकड़ों से तो यह नहीं लगता कि भारतवासियों को लोकतंत्र में विश्वास रह गया है। देश की राजनीतिक राजधानी दिल्ली तक का हाल बुरा है। जब से दिल्ली में विधानसभा का गठन हुआ है, तीन बार चुनाव हो चुके हैं। शायद ही कभी मतदान 50 फीसदी से ज्यादा गया हो।
सरकारों और चुनाव आयोग का इसका अहसास है। एक दिन टीवी पर दिखाया जा रहा था कि दिल्ली में मतदान में भाग लेने के लिए मुहिम चलाई जा रही है। कहा जा रहा है कि मतदाता पहचान पत्र आपके बैंक एकाउंट खोलने, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने, पासपोर्ट हासिल करने के लिए ही नहीं है। इसका इस्तेमाल वोट डालने के लिए भी करें। देख-सुनकर अच्छा लगा कि अगर लोगों को एेसे ही कुछ और अहसास दिलाए गए, तो मतदान का प्रतिशत बढ़ जाएगा। क्या सरकार कानून बनाकर मतदान को हर नागरिक के लिए जरूरी करने के बारे में नहीं सोचेगी।