बुधवार, 26 नवंबर 2008

मरने वाले खुशकिस्मत हैं...

मुंबई में बुधवार रात हुए आतंकी हमले में मारे गए 100 से ज्यादा लोग खुशकिस्मत हैं। नेता-मंत्री उनके घर आएंगे और कहेंगे कि वह व्यक्ति देश के लिए बलिदान हो गया। प्रशासनिक अधिकारी हमले में मृत परिवारों के परिजनों को तरह-तरह की सांत्वना देंगे। टीवी चैनल बार-बार उनके शव दिखाएंगे। परिवारवालों को रोते-बिलखते हुए दिखाएंगे। मरने वालों में से कई की वीरता और साहस की कहानियां अखबारों में प्रमुखता से छपेंगी। कुछ दिन तक तरह-तरह की अटकलें लगाई जाती रहेंगी। कोई कहेगा कि यह मालेगांव विस्फोट के मामले को ज्यादा तूल देने का नतीजा है, तो यह कहने वाले भी कम नहीं होंगे कि सरकार आतंकवाद के मोरचे पर सबसे ज्यादा कमजोर साबित हुई है।
आज मध्यप्रदेश में मतदान हो रहा है। राजस्थान और दिल्ली में मतदान होना है। क्या राजनीतिक लाभ के लिए कोई राजनीतिक दल भी यह काम कर सकता है। बदकिस्मत हैं, वे लोग जिन्हें न तो आतंकियों की मजबूत गोली लगी और न ही पुलिस की गोलियां इनकी जान ले पाईं। इनके दुर्दिन आ गए हैं। घायलों को अपने जख्मों से ज्यादा पुलिस और अन्य विभाग के अफसरों द्वारा पूछे जाने वाले सवालों की चिंता करनी पड़ेगी। वे पूरे मामले में चाहकर भी निर्दोष नहीं रह पाएंगे। अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में उनका इलाज न जाने कब ठप पड़ जाएगा, क्योंकि कोई मंत्री और नेता वहां टपकने वाला होगा। उन्हें मंत्री जी और नेताओं के घड़ियाली आंसू देखने पड़ेंगे। झूठे दावे और खुद उसके लिए कोरे आश्वासन बरदाश्त करने पड़ेंगे। उनको और उनके घर वालों को उनका उद्धार करने के सपने दिखाए जाएंगे। इस काम को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनियां गांधी, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवाणी सभी करेंगे। चुनावी मुद्दा बनाने की बात की जाएगी। दिल्ली में विस्फोट के बाद अपने सूट्स को लेकर चर्चा में रहे गृह मंत्री शिवराज पाटिल शायद फिर दोहरा दें कि पोटा को फिर से नहीं लागू किया जाएगा। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह आतंकी गतिविधियों के लिए तुरंत पाकिस्तान को आड़े हाथ लेते हुए उस पर हमला करने की भी बात करेंगे। वह तब भूल जाएंगे कि उनकी पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया था और लाहौर पहुंच गए थे।
कुछ दिन तक ये सब घायलों को ही नहीं, देशभर के आहत लोगों को मजबूरी में सुनना होगा। कुछ स्कूलों के बच्चे मरने वालों की याद में धर्मस्थलों, सार्वजनिक स्थानों और समुद्र और अन्य नदियों के किनारे मोमबत्तियां जलाकर मृत आत्माओं की की शांति के लिए आयोजन करेंगे। टीवी और अखबार वाले जब पूरी व्यवस्था में खामियों और अफवाहों का जिक्र करते-करते थक जाएंगे, स्पेशल कमेंट देने वाले खूबसूरत और प्रतिष्ठित चेहरों के विचार सूख जाएंगे, तो सब कुछ भुला दिया जाएगा। कुछ घायलों की देर से होने वाली मौत खबर नहीं बन पाएगी। घायलों में अगर कोई जीवन भर के लिए अपाहिज हो गया होगा, तो उसको मुआवजा भी शायद ही मिले। अगले साल 26 नवंबर पर मरने वालों की बरसी मनाई जाएगी। इसी बहाने उनको याद कर लिया जाएगा, लेकिन घायल लोगों को तब भी शायद ही याद किया जाए।

2 टिप्‍पणियां:

कामोद Kaamod ने कहा…

sharmnak, dukhad, nindneeya.
sabhi shaido ko shadhanjali.

प्रवीण त्रिवेदी ने कहा…

" शोक व्यक्त करने के रस्म अदायगी करने को जी नहीं चाहता. गुस्सा व्यक्त करने का अधिकार खोया सा लगता है जबआप अपने सपोर्ट सिस्टम को अक्षम पाते हैं. शायद इसीलिये घुटन !!!! नामक चीज बनाई गई होगी जिसमें कितनेही बुजुर्ग अपना जीवन सामान्यतः गुजारते हैं........बच्चों के सपोर्ट सिस्टम को अक्षम पा कर. फिर हम उस दौर सेअब गुजरें तो क्या फरक पड़ता है..शायद भविष्य के लिए रियाज ही कहलायेगा।"

समीर जी की इस टिपण्णी में मेरा सुर भी शामिल!!!!!!!
प्राइमरी का मास्टर