मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

जब तोप मुकाबिल हो...

चुनाव की चखचख के बीच नामी पत्रकार जरनैल सिंह द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंकने(जूता उछालना ज्यादा ठीक है) की घटना ने काफी कुछ कह दिया है। इस पर अभी बहस और चर्चाओं का सिलसिला चलेगा। मामला आखिरकार पत्रकारों से जुड़ा है। मैं जल्दी में अपनी प्रतिक्रिया के लिए शब्द ही नहीं तलाश पाया। चिंतन-मंथन के बाद मैंने कुछ इस तरह सोचा हैः

1. जूतों का व्याकरणीकरण और मुहावरीकरण यों ही नहीं हुआ। जब कोई कहता था कि जूतों में दाल बंट रही है तो कुछ भी समझ में नहीं आता था। फिर सुना कि मियां की जूती मियां की चांद भी मुहाबरा है। इसको निजी क्षेत्र में काम करने वाले जब-तब महसूस करते हैं। कई बार आदमी अपने झूठ और गलतियां छिपाने के लिए कह देता है कि आपका जूता मेरा सिर।

2 जूतों का बाजारीकरण तब हुआ था,जब मॉडल मिलिंद सोमण और मधु सप्रे ने एक जूते का विज्ञापन किया था। इसको लेकर पैदा हुए विवाद ने जूते की कदर बढ़ा दी। नहीं तो मेरे स्वर्गीय बाबा उजागर लाल मिश्रा ने एक बार उनके मात्र 60 रुपये के जूते लाने पर मेरे पिताजी को ताना मारा था कि 60 रुपये का जूता हो या छह रुपये का, पहना तो पैर में ही जाना है। शायद वह अपनी यूनाइटेड किंगडम निर्मित 60 रुपये की लाइसेंसी बंदूक की कीमत आंक रहे थे।

3। यों नेता आपस में खूब जूतम-पैजार करते ही रहते हैं। लेकिन उप्र की मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी बसपा की ओर से जूतों का राजनीतिकरण कर काफी इज्जत बख्शी गई। उनके कार्यकर्ताओं ने नारा दिया था- तिलक तराजू और तलवार- इनको मारो जूते चार। हालांकि सर्वजन की पार्टी बनने की प्रक्रिया में मायावती ने इससे लगातार इनकार करती हैं। वह नेता कुछ भी कह सकती है। किसी भी बात से मना कर सकती हैं। तमाम नेता ऐसा करते रहे हैं। अब चुनाव हैं, रोज करेंगे।

4। जूतों का महत्व मुझे पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में तब समझ में आ गया था, जब मैं लखनऊ विश्विवद्यालय की रिपोर्टिंग करता था। उस समय के एक प्रो-वाइस चांसलर(बाद में वह पूर्वांचल के एक प्रतिषिठत शैक्षिक संस्थान के दो बार कुलपति रहे)और छात्रों के बीच जूते चल गए थे। तब यह अंदर के पन्ने की भी खबर नहीं बनती थी। सो इसे मैंने इसे अपने साप्ताहिक कालम में दुस्साहस कर सर आओ, जूता-जूता खेलें शीर्षक से छाप दिया। फिर क्या था। छात्र आंदोलन पर आमादा हो गए। पीवीसी साहब दबंग छवि के थे। बावजूद इसके उन्होंने अपने एक अति विश्वस्त पूर्व छात्र और मेरे अच्छे मित्र के जरिए मुझसे एतराज जताने को कहा। अंततः पीवीसी साहब से आमने-सामने की मुलाकात हुई और जूता प्रकरण समाप्त हो गया।

5। जूतों का अंतरराष्ट्रीयकरण 14 दिसंबर, 2008 को तब हुआ, जब इराक के पत्रकार मुंतजर जैदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश जूनियर पर गुस्से का इजहार करने के लिए जूता फेंक कर मारा था। भारत के पत्रकार ने इस मामले में दूसरी पायदान हासिल कर ली। हम भारतीय नंबर एक पर रहने में शायद तौहीन समझते हैं।

6। इस संदर्भ में एक शोध किया जाना चाहिए कि जूता फेंकने की घटना में कहीं आर्यो-अनार्यों की उत्पत्ति, उनके ज्ञान और उनकी अनंत यात्रा और इनसे जुड़े मिथकों से तो कोई संबंध नहीं है।

7। जमाना बदल गया है। जरनैल का जूता बनाने वाली कंपनी को चाहिए कि वह जरनैल को अपना ब्रांड एंबेसडर बना लें। इससे युवा और हाल-फिलहाल पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ रहे पत्रकारों को जबरदस्त प्रेरणा मिलेगी। वह इसे चीयर गर्ल जैसे कैरियर के तौर पर अपना सकते हैं। इसकी वजह है कि राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में पत्रकारों की कलम की कीमत कम हो गई है। वह कुछ भी लिखते रहें, शासन-प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंगती।

8। मौजूदा हालात को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री और नेताओं को ही नहीं, जिलास्तरीय अधिकारियों को ऐस व्यवस्था करनी होगी कि पत्रकार उससे मिलने से पहले अपने जूते बाहर उतार कर आएं। प्रेस कांफ्रेंस में जूते पहन कर आना वर्जित कर दिया जाए। प्रेस कांफ्रेंस स्थल को धर्मस्थल का दर्जा दिया जाए!

9। लेकिन जरूरी यह भी है कि एसी प्रेस कांफ्रेंस में माननीय मंत्री जी पूरी सत्यनिष्ठा से वक्तव्य दें। देश और समाजा से जुड़े़ सवालों पर गुमराह करने की कोशिश न की जाए। नेता इन आयोजनों का सांप्रदायिक उन्माद फैलाने, भ्रष्टाचारियों का बचाव करने और विरोधियों पर अनर्गल आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल न करें।

4 टिप्‍पणियां:

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

आप ने बिलकुल ठीक कहा...!जब कहीं भी सुनवाई नहीं होगी तो आक्रोश फूटना लाज़मी है...ऊपर से अपराधी ही टिकट लेकर हमारी भावनाओं से खेलते है...!लेकिन जनता है वो सब जानती है...ये लोग जीत नहीं पाएंगे..!

pankaj vyas ने कहा…

aapki is post ko ratlam, Jhabua(M.P.), dahood(Gujarat) se Prakashit Danik Prasaran me prakashit karane ja rahan hoon.

kripaya, aap apan postal addres send karen, taki aapko ek prati pahoonchayi ja saken.

pan_vya@yahoo.co.in

बेनामी ने कहा…

pradeep ji,
saat april ka aap ka chalya joota aaj 25 april ko dekha (laga).
kaanta laga ka remix bhi ban sakta hai.
jooooootaaaa lagaaaaaa, hai lagaaaaa.
galib ne kaha tha- jab joote ke muhan mein paier dalloge to kateiga hi.
sajjan kumar aur jagdish tytler ko kata
joote main jeebh bhi hooti hai. netaon ki jeebh chalegi to matdataon ka joota.
joote per agra ke nazeer akabarabadi ne bhi likha hai-
joote jo unke churata hai so voh bhi aadmi.
neta bhi aadmi hai aur joote wala bhi aadmi. (aadminama)
maine bhi blog banaya hai- dakhilkhariz.blogspot.com-
nazr-e-inayet ka talib
galib

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

thik kahaa aapne...par may me nahi aaye aap....!